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श्री कृष्ण की कहानियां

जब श्री कृष्ण ने अर्जुन का अभिमान खण्डित किया

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भगवान् श्रीकृष्ण अपने भक्तों का अभिमान रहने नहीं देते। इसका प्रमाण प्रस्तुत करते हुए मैं अपने कथन के समर्थन में श्री कृष्ण और अर्जुन से सम्बंधित एक ऐसी कहानी बताने जा रही हुं जहां प्रभु ने अपने प्रिय सखा अर्जुन का विश्व के सर्वश्रेष्ठ धनुर्धर होने के गर्व को खण्डित किया था। एक बार अर्जुन और श्री कृष्ण प्रातः भ्रमण केलिए निकले थे तब पार्थ ने श्री कृष्ण से कहा कि वे अर्थात अर्जुन रामायुग में सेतुबन्ध के काल में होते तो प्रभु को इतनी परेशानी उठाकर बानर भालुओं की सहायता से सेतु न निर्माण करवाना पड़ता। कारण पूछने पर उन्होंने स्पष्ट किया कि वे अपने गाण्डिव (अर्जुन के धनुष का नाम) की सहायता से मात्र एक बाण से यह कार्य चुटकियों में कर देते। यह सुनकर भक्तवत्सल श्री कृष्ण ने कुछ नहीं कहा अपितु मुस्कुरा दिया। भ्रमण करते-करते वे एक ऐसे स्थान पर पहुँचे जहाँ छोटी सी नदी थी अर्जुन को अपनी बात को प्रमाणित करने का अवसर मिल गया और उन्होंने तुरंत उसपर एक सेतु बन्ध कर दिया। उसी समय श्री कृष्ण जी की प्रेरणा से राम भक्त हनुमान वहाँ आ पहुंचे और श्री कृष्ण ने पहले उन्हें पुल पार करने को कहा। परन्तु हनुमान जी के पांव रखते ही सेतु टूट गया और हनुमान जी गिरते-गिरते बचे। अर्जुन हतप्रभ हो गये। प्रभु ने अर्जुन से कहा कि जब अर्जुन का पुल एक हनुमान जी के भार को नहीं सम्हाल पा रहा है तो रामावतार में ऐसे हजारों भालू-बन्दरों को कैसे सम्हाल पाता। 

अर्जुन का शीश शर्म से झुक गया व उनका गर्व चूर्ण-चूर्ण हो गया।वे प्रभु के चरणों में गिरकर क्षमायाचना करने लगे तथा प्रभु का धन्यवाद भी किया। मधुसूदन ने अपने सखा गाण्डिव धारी अर्जुन को गले से लगा लिया। इसप्रकार द्वारिकाधीश ने पाण्डूपूत्र अर्जुन को गर्व रहित कर दिया।

कृष्ण जब गोकुल पहुंचे 

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आकाशवाणी के अनुसार जब देवकी के अष्टम गर्भ श्री कृष्ण का जन्म हुआ देवकी और सभी द्वारपाल गहन निद्रा में चले गये।वासुदेव जी की बेड़ियाँ कट गयीं ओर सारे द्वार खुल गये। प्रभु के निर्देश के अनुसार वसुदेव जी नवजात शिशु को लेकर गोकुल की ओर चल पड़े। मार्ग में यमुना नदी पड़ी। बारिश हो रही थी यमुना काजल अपने उफान पर था। वसुदेव जी कान्हा को लेकर यमुना के जल में उतर गये। जैसे-जैसे वे पानी में नीचे उतरते जा रहे थे यमुना जी का जल स्तर बढ़ते जा रहा था। बैकुण्ठ से शेषनाग जी भी आ गये व छत्र बनअपने प्रभु श्री कृष्ण की बारिश के जल से सुरक्षा करने लगे।
लेकिन वासुदेव जी की परेशानियां वैसे हीं थीं। हुआ यूं कि यमुना जी श्री कृष्ण की पटरानी मानी जाती हैं और जब उन्होंने अपने प्राणप्रिय को इतने निकट देखा तो चरण पखारने के लिए अपना जल स्तर बढ़ाने लगीं। लीलाधर श्री कृष्ण तो डलिया में थे उस पर भी यमुना जी की चरण प्रक्षालन की तत्परता को देखकर वे लीला करने लगे। अर्थात जब यमुना जी अपना जलस्तर बढ़ाकर प्रभु का चरण स्पर्श करना चाहती कृष्ण अपने पैर को ऊपर खींच  लेते और यमुना जी का जल और बढ़ते जाता तथा उनकी इच्छा प्रबल होती जाती।इधर इन सबसे अनभिज्ञ वासुदेव जी को जल के बढ़ने से यमुना पार करने में कठिनाई होने लगी।अपने पिता को कष्ट में देखकर कान्हा ने अपना पाँव नीचे लटका दिया जिससे यमुना जी ने प्रभु के चरण स्पर्श कर अपना जल स्तर कम कर लिया व वसुदेव जी को मार्ग दे दिया। वसुदेव जी अब गोकुल में हैं। सारे गोकुलवासी गहन निद्रा में हैं यहाँ तक की यशोदा के साथ पूरा नंद भवन भी। वासुदेव जी ने कान्हा को यशोदा जी के बगल में सुला दिया व उनकी नवजात पुत्री महामाया को अपने काल कोठरी में ले आये। इस तरह कन्हैया का जन्म तो कारागार में हुआ परन्तु वे नंद ग्राम गोकुल पहुंच गए।

अष्टभुजी महारानी का प्राकट्य 

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श्री कृष्ण जन्म के समय श्री कृष्ण की आज्ञा से महामाया ने सबको मोहित कर दिया था जिसके कारण कृष्ण का गोकुल जाना तथा महामाया का मथुरा आना सम्भव हो सका।  यशोदा की पुत्री देवकी के पास आ गयीं व उनके कारागृह में आते ही सब पूर्ववत हो गया अर्थात वासुदेव जी की बेड़ियाँ लग गयीं, कारागार के द्वारों के खुले हुए ताले पुनः बंद हो गये, सभी पहरेदार तथा माता देवकी जागृत अवस्था में आ गये आदि। तभी सभी द्वारपाल कन्या के रोने के आवाज को सुना। कन्या जन्म की सुचना पाकर कंस कारागृह में आया व यह जानते हुए भी कि यह पुत्री है देवकी के अन्य पुत्रों की भाँति उसे उठाकर ले गया और जैसे ही वह पापी उस नवजात शिशु कन्या को पत्थर पर पटककर मारना चाहा वह कन्या उस अत्याचारी के हाथों से छूटकर आकाश में उड़ गयी। आकाश में अष्टभुजा रूप धारण कर उन महामाया अष्टभुजी महारानी ने कहा-''हे पापी कंस तू मुझे क्या मारेगा तुझे मारने वाला तो धरती पर जन्म ले चुका है।यह कहकर वह कन्या विन्ध्याचल पर्वत पर जा स्थित हुईं व विन्ध्यवासनी अष्टभुजी माँ के रूप में जग विख्यात हुईं।

पूतना ने जब दुग्धपान कराया

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जब बाल-कृष्ण का गोकुल में जन्मोत्सव होता है सभी गोकुलवासी मिलकर बालक जन्मोत्सव धूमधाम से मनाते हैं। जब कंस को यह पता चलता है तो उसे इस बालक पर यह संशय होता है कि शायद यही देवकी की आठवीं संतान है और वह पूतना नामक राक्षसी को उस बालक के वध के लिए गोकुल भेजता है। 
पूतना अपने रूप परिवर्तन में पूर्णतः निपुण होने के कारण एक सुंदर स्त्री का रूप धारण कर नन्द गृह पहुंचती है। जहाँ वह अपने रूप से सबको मोहित कर बालक को अपना दुग्धपान कराने लगती है। उसने पहले से ही अपने स्तनों पर कालकूट नामक. भयंकर विष का लेप कर रखा था जिससे कृष्ण पिते ही मृत्यु के मुख में समा जाएं। परन्तु कृष्ण ने उसकी कुटिलता को भांप लिया और दुग्धपान करते करते उसका प्राण भी पीने लगे। 
वह पीड़ा से चिल्लाते अपने राक्षसी रूप में आते तथा अपना स्तन छुड़ाते हुए आकाश मार्ग से भागने लगी परन्तु बालकृष्ण ने उसका प्राण पीकर उसे मोक्ष प्रदान किया।
मरने के पश्चात वह राक्षसी श्री कृष्ण को लिये हुये नीचे गिर पड़ी। उसके विशालकाय शरीर के इस प्रकार धराशायी होने के कारण उस वन के सैकड़ों वृक्ष उसके चपेट में आ कर क्षत-विक्षत हो गये। बाद में कयी टुकड़ों में विभाजित कर उसका दाह संस्कार किया गया।पूतना की पूर्व जन्म की कहानी अगले भाग में पढ़िये। 

भाग-2
कहा जाता है पूतना पूर्व जन्म में भक्त प्रह्लाद के प्रपौत्र राजा बली की बहन रत्नमाला थीं। जब कश्यप और अदिति की संतान 'वामन' के रूप में भगवान् ने अवतार लिया तब रत्नमाला उनपर मोहित हो गयी और उन्हें पुत्र बनाने का विचार किया परन्तु जब वामन के रूप में विष्णु जी के द्वारा अपने भाई को छलते हुए देखा तो विचार किया कि यदि मेरा ऐसा पुत्र होता तो मैं उसे दूध के साथ विष पिलाकर मार देती और रत्नमाला की इस इच्छा को विष्णु जी ने शिरोधार्य कर कृष्ण जन्म में यह लीला रचाई।
कहा जाता है पूतना का दुग्धपान कर श्री कृष्ण ने उसे भी अपने माता का स्थान दिया।

श्री कृष्ण और अघासुर

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(भाग-1) एक बार की बात है बाल कृष्ण अपने बाल सखाओं के साथ वृंदावन में गाय चरा रहे थे कि उन्हें सामने एक बड़ा सा गुफा मिला। श्री कृष्ण जानते थे कि यह एक सामान्य गुफा नहीं है अपितु मथुरा के राजा कंस के द्वारा भेजा गया अघासुर नामक अजगर रूपी राक्षस है जो कृष्ण को खाने आया था। लेकिन ग्वाल बालों को यह कहाँ पता था वे उत्सुकता वस उस अजगर के  गुफा रूपी मुख में जा घुसे।यह जानते हुए भी कि यह यह राक्षस है ग्वाल बालों की रक्षा के लिए कृष्ण को भी उस काल रूपी राक्षस के मुख्य में प्रवेश करना पड़ा। कान्हा के मुख्य के अन्दर आते ही उस अजगर ने अपनामुख. बंद कर लिया। जब सभी गोप ग्वाल डरकर मूर्छित हो गये तब कृष्ण ने अपना आकार बढ़ाया और उस अजगर का मुख्य चीर डाला।अब अघासुर कौन था? उसे श्राप किसने दिया व उसे अभी श्राप से मुक्ति कैसे मिली कहानी के अगले अंक में.....

(भाग-2) आप लोगों ने इस कहानी के प्रथम भाग में पढ़ा कैसे कृष्ण ने अघासुर नामक राक्षस का वध किया अब इस भाग में हम पढ़ेंगे कैसे उस पापी का उद्धार हुआ। 
जब श्री कृष्ण ने उस अजगर का मुख चीर डाला उसमें से एक ज्योति रूप आत्मा निकली। उसने श्री कृष्ण को प्रणाम कर उन्हें अपने श्राप की कथा सुनाई। 
उसने बताया कि- बहुत समय पूर्व की बात है वह आदिदैत्य शंखासुर का पुत्र था।
सुंदर शरीर एव असुर स्वभाव के कारण उसे अपने सुंदरता पर बहुत अभिमान था। एक दिन महर्षि अष्टावक्र *को देखकर उस अभिमानी ने उनका उपहास उड़ाया। पहले तो क्षमा मुर्ति महर्षि ने उसे क्षमा कर दिया परन्तु जब वह ईश्वर की रचना का उपहास बार बार करता रहा तो महर्षि ने उसे श्राप दे डाला कि जिस सुंदर शरीर पर उसे इतना अभिमान है वह काया अनेकों जगह से टेढ़े होने वाले अजगर की भांति हो जाये। श्राप सुनकर अघासुर रो-रोकर क्षमा माँगने लगा। तब दयामुर्ति महर्षि ने कहा श्राप तो व्यर्थ नहीं जायेगा पर द्वापर युग में श्री कृष्ण के आने पर इस श्राप से उद्धार जायेगा और आज ऋषि का श्राप रूपी वरदान सत्य सिद्ध हो गया। यह कथा सुनाकर वह अघ मुक्त हो उन परब्रह्म में विलीन हो गया। और श्री कृष्ण खुशी-खुशी ग्वाल-बालों के साथ घर पहुंच गये। 


*अष्टावक्र - अष्ट अर्थात आठ +वक्र अर्थात टेढ़ा, या उसे सरल भाषा में कहें तो विकलांग था जिसके कारण उनका नाम अष्टावक्र पड़ गया। 
*नैतिक शिक्षा - अभिमान न करना - अपने किसी भी विशेषता पर अभिमान या घमण्ड कर किसी का उपहास नहीं करना करना चाहिए।

श्री कृष्ण और बकासुर

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एक बार कृष्ण गौएं चराते हुए यमुना नदी के तट पर गये। 
वहां सभी गोप ग्वालों को एक विशालकाय बगुला दिखा। यह बगुला एक राक्षस था जिसे श्री कृष्ण के मामा कंस ने श्री कृष्ण को मारने के लिए भेजा था। 
कन्हैया उस राक्षस को देखते ही पहचान गये। वे उसके पास गये। कृष्ण को देखते ही बगुला उन्हें मुख में भरकर निगलने की कोशिश करने लगा। 
मुख में जाते ही श्री कृष्ण ने योगाग्नि प्रकट की। बकासुर उस गर्मी को सहन न कर सका और उसने श्री कृष्ण को बाहर उगल दिया। मौका पाकर श्री कृष्ण ने उसके चोंच को चीर डाला। इस तरह श्री कृष्ण ने उस पापी का उद्धार कर दिया।

कालिया नाग और श्री कृष्ण 

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श्री कृष्ण और ग्वाल बाल यमुना तट पर गेंद खेल रहे थे। खेलते खेलते गेंद यमुना नदी के गहरे कुण्ड में जा गिरी जिसे कालिय दह के नाम से जाना जाता था। उस दह में कालिया नामक एक विषैला नाग 
रहता था जिसके विष के प्रभाव से उस कुण्ड का जल विषैला हो गया था और खौलता रहता था।कोई भी पशु पक्षी उस कुण्ड का जल ग्रहण तो नहीं ही करता था उधर से गुजरता भी नहीं था।  सभी बच्चे श्री कृष्ण से अपनी गेंद वापस करने की जिद करने लगे, 
श्री कृष्ण ने आव देखा न ताव वे कलि-कदम्ब की एक शाखा पर चढ़े और कालियदह में छलांग लगा दी। अब तो गोकुल में हाहाकार मच गया। यशोदा माँ का रो-रोकर बुरा हाल था। इधर जब श्याम यमुना के अन्दर गहराइयों में गये तो कालिया नाग सो रहा था। उसकी पत्नियों ने कान्हा को देखा और उन्हें लौट जाने को कहा।
पर श्री कृष्ण ने स्पष्ट मना कर दिया। शोर सुनकर कालिया नाग जाग गया और फूफकार मारने लगा। कान्हा और नाग में. युद्ध होने लगा उस नाग ने कन्हैया को अपने कुंडली में जकड़ लिया। बहुत देर तक दोनों में संघर्ष चलता रहा अंततः वह नाग श्री कृष्ण के पद प्रहारों को सहन करते करते थक गया और उसने हार मान ली। कालिया नाग जब श्री कृष्ण से युद्ध करते - करते थक गया वह श्री कृष्ण से क्षमा प्रार्थना करने लगा। 
उसने बताया वह कद्रू नाग का पुत्र एवं पन्नग जाति का नाग है एवं पक्षियों के राजा गरूण के भय से अपने परिवार के साथ यहां छिपा है। गरूण जी सौंभरी ऋषि के श्राप के कारण यहाँ नहीं आते थे और इसीलिए वह जानबूझकर यहां आया जिससे वह निर्भय होकर रह सके। 
 तब श्री कृष्ण ने कालिया नाग को अभय देकर उसे यमुना छोड़कर उसके पूराने स्थान रमणक द्वीप पर जाने को कहा और यह भी कहा कि श्री कृष्ण के पदचिन्हों उसके मस्तक पर देख गरूण उसका कुछ अहित करने के स्थान पर पूजा करेंगे। 
उसके बाद कालिया नाग बंशी-बजैया को अपने फन पर धारण कर यमुना के सतह पर ले गया जहाँ प्रभु ने नृत्य किया और अंततः वह नाग उन्हें यमुना तट पर पहुँचाकर स्वयं सपरिवार सदा के लिए वहां से चला गया। 
इस प्रसंग को भक्त लोग कालिया नाग नथइया के नाम से जानते हैं।

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