
पौराणिक कहानियां
महाभारत और गणेश जी

महाभारत की रचना जब वेद व्यास जी करने वाले थे, उन्हें एक बहुत ही बुद्धिमान लेखक चाहिए था। तब ब्रह्मा जी के कहने पर उन्होंने इस कार्य हेतु गणेश जी की आराधना की। गणेश जी इस कार्य के लिए तैयार तो हो गये, परन्तु उन्होंने एक शर्त रखी कि, -महाभारत महाकाव्य लिखवाने के मध्य में व्यास जी यदि कहीं रुके तो वे अर्थात गणेश जी इस काव्य को मध्य में ही छोड़कर चले जाएंगे।
तब व्यास सोच में पड़ गए।कुछ सोचकर उन्होंने गणपति से यह निवेदन किया कि वे(व्यासजी) अपनी बातों को कठिन श्लोक में कहेंगे लेकिन उस श्लोक को लिपिबद्ध करने से पूर्व गणेश जी उसे सरल श्लोकों में परिवर्तित कर लेंगे। तब गजानन उनकी बुद्धिमत्ता को देखकर अतिप्रसन्न होते हुए उनके रचित काव्य को लिपिबद्ध करने के लिए सहमति हो गये।
कहा जाता है कि इस दौरान उन गौरीपूत्र की लेखनी टूट गयी परन्तु उन्होंने लेखन कार्य को रोका नही अपितु अपने एक दांत को तोड़ कर उसकी लेखनी बनाई और उन विघ्नहर्ता ने निर्विघ्न रूप से यह महाकाव्य पूर्ण किया। तभी से गजमुख का एक नाम एकदन्त भी पड़ गया।
हनुमान जी और राहू

एक बार पवनपुत्र हनुमान जी सूर्य देव के पास विद्याध्ययन हेतु गये। परन्तु सूर्यदेव ने उन्हें यह कहकर मना कर दिया कि वे (सूर्यदेव) हमेशा चलते रहते हैं और इस तरह हनुमान जी को विद्या दान करने में वे सर्वदा असमर्थ हैं। हनुमान जी बल बुद्धि के धाम ठहरे। उन्होंने एक ऐसा उपाय निकाल लिया जिससे दोनों का कार्य निर्बाध रुप से होने लगा। हुआ यूं कि सूर्यदेव आगे-आगे चलते जाते व हनुमान जी को शिक्षा देते जाते और वहीं हनुमान जी सूर्यदेव के पीछे-पीछे उल्टे गति से चलते हुए विद्या ग्रहण करते जाते।
परन्तु एक दिन राहू जब अपने समयानुसार सूर्यदेव को ग्रसने आया, मारूति ने उसे लात मार कर खदेड़ दिया तब वह पुनः इन्द्र को लेकर आया। इन्द्र और हनुमान जी की झड़प हुई और इन्द्र भगवान् का वज्र उनके हाथ से छुटकर हनुमान जी के हनु अर्थात ठोड़ी पर जा गिरा जिससे हनुमान जी मूर्छित हो गये और उनकी ठोड़ी टूट गई। तीनों लोकों में हाहाकार मच गया। सब देवों का आगमन हुआ। सबने मिलकर महावीर जी को आशिर्वाद दिया और उनके हनु का मान रखते हुए उसे पुनः जोड़ दिया। तभी से मारुति-,हनुमान नाम से जग विख्यात हुए। और राहू आज भी हनुमान जी के नाम से डरता है।
जगतजननि माँ एवं सृष्टि का प्राकट्य

एक बार जब सम्पूर्ण सृष्टि में प्रलय आया और सबकुछ जलमग्न हो गया तब सर्वत्र बस ॐव्याप्त था। उस समय सम्पूर्ण सृष्टि की शक्ति एकत्र हुई और एक शक्तिपूंज के रूप में परिवर्तित हुई। समय पाकर वह शक्तिपूंज एक नारीशक्ति के रूप में रूपांतरित हुइ। तब उस नारी रूप परमेश्वरी में पुनः सृष्टि संरचना का विचार आया। इस विचार से उन्होंने तीन पिंड प्रकट किया और उस पिंड में प्राण प्रतिष्ठित किया।वे आद्यशक्ति उन्हें ब्रह्मा विष्णु व महेश नाम से सम्बोधित करते हुए उन्हें क्रमशः सृजन, पालन एवं संहार का कार्यभार सौंपा एवं उनके इस कार्य में उनके सहयोग के लिए उन्होंने स्व से तीन रूप निर्गत किये। जिन्हें क्रमशः "महागौरी" शिव की शक्ति, "महालक्ष्मी" विष्णुजी की शक्ति, एवं "महासरस्वती" अर्थात् प्रजापति ब्रह्मा जी की शक्ति के नाम से जग में जाना जाता है। माता की यही तीन महाशक्तियां भारत के जम्मू राज्य में त्रिकुट पर्वत पर आज भी माँ वैष्णो देवी तीर्थ के नाम से अवस्थित है। कहा जाता है कि माता वैष्णो देवी का रूप कौमार्य रूप है जो कलियुग में आने वाले विष्णु जी के दशम अवतार की प्रतीक्षा कर रहा है।
सर्वश्रेष्ठ देव कौन?

एक बार सरस्वती नदी के तट पर हो रहे सत्संग के समय ऋषियों में यह विवाद का विषय बना की ब्रह्मा विष्णु एवं महेश तीनों में ज्यादा धैर्य शील और श्रेष्ठ कौन है?
अन्ततः सबने सोंचा की इसकी परीक्षा करते हैं। परीक्षा का कार्यभार महर्षि भृगु जी के कंधों पर दिया गया।
महर्षि भृगु सर्वप्रथम अपने पिता ब्रह्मा जी के पास गये जहां उन्होंने और अपने पूज्य पिता ब्रह्मा जी को प्रणाम नहीं किया जिसके कारण ब्रह्मा जी ने अप्रकटित क्रोध किया। भृगु जी को इसका भान हो गया एवं वे चल दिए शिव जी की परीक्षा लेने जहां शिवजी माता पार्वती के साथ बैठे। भृगु जी ने वहां भी शिव जी के साथ अशिष्ट व्यवहार प्रदर्शित किया जिसके कारण शिव जी अत्यंत क्रोधित हो उनके वध हेतु त्रिशूल उठा लिया किन्तु मांँ पार्वती के कहने पर शिव जी ने उन्हें छोड़ दिया। अंततः महर्षि क्षीरसागर में शेषशय्या पर योग निद्रा में लिप्त श्री हरि के पास गये जहाँ माता लक्ष्मी उनके चरण दबा रहीं थीं। भृगु जी ने आव देखा न ताव विष्णु जी के वक्षस्थल पर एक लात मार दी।
परन्तु विष्णु जी ने तो मुस्कुराते हुए कहा- हे महर्षि आपके कोमल पैरों पर कहीं चोट तो नहीं आयी। यह सुनकर महर्षि अत्यंत लज्जित हुए और उन्हें सारा वृतांत सुनाते हुए सर्वश्रेष्ठ देवता घोषित कर दिया।
जगन्नाथ जी

वर्तमान भारत देश के उड़ीसा नामक राज्य में पूरी नाम से एक पवित्र स्थान है, जहाँ भगवान् जगन्नाथ जी का विश्व प्रसिद्ध मन्दिर अवस्थित है। इस मंदिर में भगवान् जगन्नाथ जी अपने बड़े भाई बलभद्र एवं छोटी बहन सुभद्रा जी के साथ विद्यमान हैं। भगवान् की यह मूर्ति अधूरी है पर क्यों?
क्योंकि स्कन्दपुराण के अनुसार, नीलांचल के राजा, राजाइन्द्रद्युम्न जब भगवान् के खोज में जहां -तहां भटक रहे थे, उन्हें स्वप्न में भगवान् जगन्नाथ जी ने समुद्र के किनारे एक बरगद के वृक्ष में से तराशकर स्वयं की स्थापना करने को कहा। राजा ने सुबह उठकर बहुत से शिल्पकारों से इस बारे बात की पर कोई भी इस कार्य हेतु तैयार नहीं हुआ।
एक दिन देवशिल्प विश्वकर्मा जी वृद्ध ब्राह्मण के वेश में राजा के समीप आये एवं वे इस शर्त पर मुर्ति बनाने के लिए तैयार हो गए कि उन्हें इस कार्य हेतु एक बंद कक्ष चाहिए जिसमें जब तक वे पूरी मूर्ति बनाकर स्वयं बाहर नहीं आयें तब तक किसीको भी प्रवेश की अनुमति नहीं हो।
राजा ने इस शर्त को स्वीकार कर लिया। मूर्ति निर्माण का कार्य आरम्भ किया। कुछ दिनों पश्चात उस बंद कक्ष से मुर्ति बनाने की आवाज आनी बंद होगयी। राजा ने वृद्ध ब्राह्मण की सलामती हेतु चिंतित होकर द्वार खोल दिया।वहां उन्हें अर्धनिर्मित मुर्ति तो मिली पर ब्राह्मण रूपी विश्वकर्मा जी वहां से जा चुके थे।इसीलिए आज भी जगन्नाथ जी का ही विग्रह काष्ठ का है व अर्धनिर्मित है।कहा जाता है कि इस मुर्ति में राजा द्वारा स्थापित श्री कृष्ण जी का दिल धड़कता है जो द्वापर युग से ही पानी में यहां-वहां भटक रहा था।
प्रजापति दक्ष की उत्पत्ति

शिव जी के प्रेरणा से जब ब्रह्मा जी इस सृष्टि का सृजन कर रहे थे,तब उनके ललाट से ब्राह्मण, भुजा से क्षत्रिय, उदर से वैश्य तथा जांघ से शूद्र की उत्पत्ति हुई।
ब्रह्मा जी के काया से चित्रगुप्त जी की उत्पत्ति हुई जिनके वंशज काया से उत्पन्न होने के कारण कायस्थ कहलाये।
उस समय सभी महर्षि, ब्रह्मर्षि,देवर्षि नारद एवं. संध्या आदि ब्रह्मा जी के ऐसे बहुत से पुत्र तथा पुत्रियां उत्पन्न हुए। वे सभी ब्रह्मा जी के मन से उत्पन्न होने के कारण मानस पुत्र एवं पुत्रियां कहलाए।
तभी एक तेज़ ब्रह्मा जी से चीख-चीख कर कहने लगा कि पिताजी मुझे भी प्रकट किजिये। ब्रह्मा जी उस क्रोध भरे आवाज को समझ नहीं पा रहे थे कि आखिर कहां से आ रही है? जब तक ब्रह्मा जी समझ पाते तब तक एक तेज़ उनके अंगुठे से निकलकर एक सुंदर, गर्वित व क्रोधित मानव के रूप में उनके सम्मुख उपस्थित हुआ। पुराणों में इन्हें ही प्रजापति दक्ष के नाम से सब जानते हैं। जिनके घर शिव जी की प्रथम पत्नी सती माता का जन्म हुआ तथा बाद में अपने पिता (प्रजापति दक्ष) से ही अपमानित होकर उनके ही यज्ञ में आत्मदाह भी कर लिया और परिणाम स्वरूप उनका यज्ञ विध्वंस हो गया और उन्हें अर्थात दक्ष का शीश काटकर बकरे का सिर लगा दिया गया।
