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हनुमान जी कहानियां

हनुमान जी को सिन्दूर क्यों लगाते हैं? 

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राज तिलक के बाद एक दिन राजा राम तो बहुत पहले अपने दरबार में आ गये पर सीता जी को आने में देर हो गयी।राम जी ने अपने प्रिय भक्त हनुमान को माता के विलम्ब होने का कारण पता करने के लिए भेजा।जब हनुमान जी रनिवास में सीता माता के पास गये वे तैयार हो रहीं थीं। हनुमान जी ने माता को सिंदूर लगाते देखा व पूछ बैठे की वे क्या लगा रही हैं और क्यों? माता क्या उत्तर देती उन्होंने कहा कि वे सिंदूर लगा रहीं हैं क्योंकि इससे प्रभु राम प्रसन्न होते हैं। थोड़ी देर बाद वे तैयार होकर दरबार में पधारीं। परन्तु हनुमान जी साथ में न थे इस कारण प्रभु की नज़रें अपने भक्त को ढूंढ रहीं थीं। तभी हनुमान जी सिंदूर से नहाये हुये वहां आ पहुंचे। श्री राम जी आश्चर्यचकित थे। उन्होंने हनुमान जी से पूछा - हनुमान जी ये क्या कर रहे हैं? और हनुमान जी जय श्री राम का लगातार जाप करते हुए अपने प्रभु श्रीराम से कह रहे थे-''पहले आप बताइए कि आप मुझपर प्रसन्न हैं कि नही।'' हनुमान जी के बारबार ऐसा कहने पर प्रभु ने कहा कि हाँ वे हनुमानजी से अत्यन्त प्रसन्न हैं। हनुमान जी की इस दशा को देखकर सीता जी मन ही मन मुस्कुराने लगी। लेकिन प्रभु श्री राम अपने भक्त से उनकी इस दशा का कारण पूछा तब हनुमानजी ने कहा कि उन्होंने विचार किया कि यदि माता के चुटकी भर सिंदूर लगाने से प्रभु उनपर अति प्रसन्न रहते हैं तो कोई यदि सारा सिंदूर पूरे शरीर पर लपेट ले तो प्रभू कितने प्रसन्न होंगे।हनुमानजी की भक्ति को देख प्रभु अति प्रसन्न हुए और कहा कि-''जो कोई भक्त हनुमानजी को मंगलवार और शनिवार को सिंदूर लगाएगा उसे राम-हनुमान की भक्ति और कृपा प्राप्त होगी।

माला में सीताराम 

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राज तिलक के बाद प्रभु श्री राम जी के द्वारा सभी को कुछ न कुछ उपहार दिया जा रहा था। सभी को उपहार मिल गया परन्तु हनुमान जी पीछे रह गये यह देख माता सीता ने उन्हें अपने गले से एक मोतियों का हार उतार कर दे दिया। हनुमानजी उस हार को तो ले लिया परन्तु कुछ समय पश्चात वे उसमें से मोती निकाल कर उसमें कुछ देखते फिर उसे फेक देते। इस तरह मूल्यवान मोतियों के हार की यह दुर्दशा देखकर सब हैरान थे, व इसे वानर स्वभाव समझकर उनका उपहास भी कर रहे थे। तभी किसी ने उनके इस मूर्खता भरे स्वभाव का कारण पूछा। तब हनुमानजी ने कहा कि इन मोतियों में वे प्रभु श्रीराम को ढूंढ रहे हैं। इन बातों को सुनकर सबने उनका और उपहास किया तथा पूछा कि जिन भगवान् को वे बाहर ढूंढ रहे हैं क्या वे भगवान् उनके मन में हैं? यदि हाँ तो दिखायें। यह सुनना था कि शंकर सुवन ने अपना सीना चीरकर सभी को अपने मन में स्थित श्री सीताराम जी के उसी छवि का दर्शन कराया जो सामने उस समय दरबार में उपस्थित थी। इस चमत्कार को देखकर सभी हैरान थे व इसतरह एकबार पुनः हनुमानजी अपनी निश्छल और निष्काम भक्ति के कारण अपने प्रभु के आँख का तारा हो गये।

हनुमान जी और राहू

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एक बार पवनपुत्र हनुमान जी सूर्य देव के पास विद्याध्ययन हेतु गये। परन्तु सूर्यदेव ने उन्हें यह कहकर मना कर दिया कि वे (सूर्यदेव) हमेशा चलते रहते हैं और इस तरह हनुमान जी को विद्या दान करने में वे सर्वदा असमर्थ हैं। हनुमान जी बल बुद्धि के धाम ठहरे। उन्होंने एक ऐसा उपाय निकाल लिया जिससे दोनों का कार्य निर्बाध रुप से होने लगा। हुआ यूं कि सूर्यदेव आगे-आगे चलते जाते व हनुमान जी को शिक्षा देते जाते और वहीं हनुमान जी सूर्यदेव के पीछे-पीछे उल्टे गति से चलते हुए विद्या ग्रहण करते जाते। 
परन्तु एक दिन राहू जब अपने समयानुसार सूर्यदेव को ग्रसने आया, मारूति ने उसे लात मार कर खदेड़ दिया तब वह पुनः इन्द्र को लेकर आया। इन्द्र और हनुमान जी की झड़प हुई और इन्द्र भगवान् का वज्र उनके हाथ से छुटकर हनुमान जी के हनु अर्थात ठोड़ी पर जा गिरा जिससे हनुमान जी मूर्छित हो गये और उनकी ठोड़ी टूट गई। तीनों लोकों में हाहाकार मच गया। सब देवों का आगमन हुआ। सबने मिलकर महावीर जी को आशिर्वाद दिया और उनके हनु का मान रखते हुए उसे पुनः जोड़ दिया। तभी से मारुति-,हनुमान नाम से जग विख्यात हुए। और राहू आज भी हनुमान जी के नाम से डरता है।

 

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