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कविता

हिंदी जज्बातों की भाषा

हिंदी जज्बातों की भाषा, 

सबके अरमानों की आशा, 

कभी अल्हड़ है कभी समझदार, 

अनुभूति इसकि कभी तेज धार। 

हिंदी भाषी का यह गुमान, 

इसके सम्मुख हैं सब समान॥

इसके शब्दों की देखो धार, 

नयनों के वार से फेंके बान। 

शालीनता से सब कुछ कह दें, 

हर भाषा करके शिरोधार्य॥

हिंदी जज्बातों की भाषा, 

सबके अरमानों की आशा, 

कभी अल्हड़ है कभी समझदार, 

अनुभूति इसकि कभी तेज धार। 

हिंदी भाषी का यह गुमान, 

इसके सम्मुख हैं सब समान॥

इसके शब्दों की देखो धार, 

नयनों के वार से फेंके बान। 

शालीनता से सब कुछ कह दें, 

हर भाषा करके शिरोधार्य॥

कभी तुलसीदास बन भजे राम, 

कभी मीरा बन कहे श्याम-श्याम॥ 

कबीर रहीम कभी रैदास, 

जयशंकर, महादेवी की बात, 

प्राचीन काल से आज तलक, 

रही हृदयांकित और पास-पास। 

न बनती है न बनाती है-

कहीं कोई कीसी को दास। 

शुभ्रा भी हिंदी को भजती, 

क्योंकि हिंदी है बेमिसाल

अपना प्यारा घर

घर एक मंदिर है, 
अपनो के सपनो का। 
अपने जहां जीते है- अपने प्यारे घर के लिए॥
अपने यहाँ बुनते है इसके मीठे-मीठे, 
सपने प्यारे-प्यारे - 
अपने प्यारे घर के लिए॥
होती हैं यहाँ पर
कुछ खट्टी-मीठी मजेदार बातें, 
बातें वो अपनो की- अपने प्यारे घर के लिए। 
ईंट-गारे की जगह, 
अपनापन और निस्वार्थ त्याग, 
होता है उपयोग यहाँ - 
अपने प्यारे घर के लिए। 
प्रेम की एक डोर-
जो है रेशम से कमजोर,
पर प्रेम से मजबूत किया-
अपने प्यारे घर के लिए। 
विपरीत विचारों के- झंझवातों से बचाते हुए, 
हौसला बुलंद किया-
अपने प्यारे घर के लिए।
दूर कुविचार करके-
सुविचारित की साधना की। 
सद्विचार सद्भावना चुना - 
अपने प्यारे घर के लिए। 
अपनो से घर है, 
घर से अपने नहीं। अपनो को बचाते हुए - 
पलकों में बिठाकर रखना, 
रिश्तों को सजोकर रखना-
अपने प्यारे घर के लिए॥

कोई एक देश नहीं रे सखी

कोई एक देश नहीं रे सखी

सम्पूर्ण विश्व ही जूझ रहा। 

क्या करे बचाए कैसे स्व को, 

कीसी को भी अब ना सूझ रहा॥

सब समय-समय की बात रही, 

कइ देश भरे निज दम्भ सही। 

पर पड़ा प्रकृति वार जहाँ - 

सबका अस्तित्व ही डोल रहा॥

अब भी सम्हलो हे मनू-पूत्र, 

जग को बचाना दायित्व तेरा-

करो नियंत्रण आचार-विचार, 

तेरे कन्धों पर यह भार बड़ा ॥

तुम सम्हलोगे जग सम्हलेगा, 

तुम जागोगे जग जागेगा, 

तुम्हरे पद-चिन्हों पर ही चलकर, 

यह अखिल विश्व भी भागेगा॥

अब हुई भोर ना सोवो तुम, 

सोकर ना सब कुछ खोवो तुम, 

हे ऋषि-पूत्र अब जागो भी, 

हर मानव का संताप हरो, 

टकटकी लगाए अखिल विश्व-

है रहा देख बस तुमको ही, 

करो प्रकृति पूजन अब, 

जग को दिखलाओ राह सही॥

भाव भाव

भाव भाव से भाव को समझे, 

भाव-नदी में डूब गया मन, 

भाव है ऊपर भाव है नीचे, 

भाव है आगे भाव है पीछे। 

बिना कहे ही भाव ने बोला, 

भाव मिला तो डोल गया मन॥

भाव समंदर भाव है सरिता, 

भाव कुरान है भाव है गीता, 

भाव वेद है औ पुराण है, 

भाव में डूबा जग जहान है॥

भाव बिना तो ये जग सूना, 

भाव बिना कुछ कहीं कभी ना॥

काम क्रोध मद लोभ भाव है, 

साम दाम दंड भेद भाव है, 

धर्म अर्थ और काम मोक्ष का, 

भाव करो आधार भाव है। 

ईश्वर से अनुरोध भाव है, 

विरह-मिलन में भी तो भाव है, 

शत्रु का आघात भाव है, 

सेवा व प्रतिकार भाव है। 

अपने महानुभावों से सुनलो-

जीवन में हर रीत भाव है। 

माँ

माँ एक अनकहा शब्द 
बंधा जिसमें भावों का पिटारा॥ 
त्याग, प्यार, सम्मान, दुलार,, 
आँखों में ममता का भाव, 
पर आँचल में समेटे है, 
जैसे जग सारा- 
बंधा जिसमें भावों का पिटारा ॥
कवियों ने मुनियों ने, शेष और शारदा ने, 
वेदों ने पुराणों ने उपनिषद की धाराओं ने, 
कहना चाहा बहुत कुछ, 
पर अंततः जग हारा
क्योंकि समझना है मुश्किल, 
बताना है मुश्किल, 
उसकी भावों को गाना है मुश्किल, 
सच है यह शुभ्रा कि- 
मां का पार ना कोई पाया, 
बंधा है जिसमें भावों का पिटारा॥
कभी वीरांगना लक्ष्मीबाई, 
कभी लवकुश को त्याग सिखाती थी, 
कभी अभिनंदन को तिलक किया, 
और विजय मार्ग को दिखलाती। 
तुम ही भाव हो कि भाव है तुममें, 
भाव हैं इतने जैसे आसमान में तारा। 
पर सच में - 
माँ है एक ऐसा शब्द, 
बंधा है जिसमें भावों का पिटारा॥

माखन चोर 

गोकुल के घर घर जा जब कृष्ण ने मटकी फोड़ी,
सभी ग्वालिनें यशोदा जी घर आयीं दौड़ीं-दौड़ीं। 
कहें यशोदा मइया से वो दोनों हाथ को जोड़, 
मईया माखन खा गया तेरा लल्ला माखन चोर॥
यशोदा यह सुन क्रोधित हो जब कान्हा को बुलवाया, 
कान्हा 'मेली प्याली मईया' कहते-कहते आया। 
तोतली-तोतली बोली सुनकर मोहित हो गयी मईया, 
प्यार छिपा डपटकर बोलीं आरे इधर कन्हैया। 
बोलीं चोरी क्यों की तुने, क्या मिलता माखन नहीं घर में? 
कान्हा रोनी सुरत बनाये, 
देत सफाई हर मन भाये॥ 
शुभ्रा इसी रूप की सारी गोपी लेते बलैया। 
श्याम रूप यह हर मन भावे जपत रहे जो कन्हैया ॥

हे गजमुख,प्यारे गौरीपूत्र

हे गजमुख,प्यारे गौरीपूत्र, 

सिन्दूर बदन हे एक दन्त, 

हे गणनायक हे लम्बोदर, 

तुमको है शत शत कोटि प्रणाम। 

हे विघ्न हरण मंगल कारक, 

हे वक्रतुण्ड हे गजकर्णक, 

हो प्रथम पूज्य सब देवों में, 

नारद शारद शेष भी तो, 

करते रहते तुमको प्रणाम।। 

शुभ्रा भी सुन लो सर्वप्रथम, 

करती है तुम्हारा अभिनंदन, 

शत कोटि नमन-शत कोटि नमन, 

करती हूँ पार्वती नंदन॥

सब मिलकर जयजयकार करें, 

हम भी तेरा गुणगान करें, 

मोदक जिनको है अति प्रिय, 

उन मोदक प्रिय चन्द्रभाल का, 

करते है हम सब अभिनन्दन ॥

कब बंशी नयी बजाओगे?

कब बंशी नयी बजाओगे? - - - - - - - - - हे धर्म पुरुष गीता वाले, 

गीता का पाठ पढ़ाने को, 

सबको सन्मार्ग दिखाने को, 

कब तुम फिर जग में आओगे? 

कब बंशी नयी बजाओगे? 

हर ओर द्रौपदी रोती है, 

दुशासन उसे रुलाता है, 

देखो प्रभु फिर से दुर्योधन, 

शकुनि के झांसे में आकर, 

युधिष्ठिर को हराता है, 

फिर अर्जुन के रक्षक बनकर तुम धर्मयुद्ध करवाओगे, 

उस धर्मयुद्ध में आकर के, 

फिर धर्म की लाज बचाओगे, 

कब बंशी नयी बजाओगे?

अज्ञान के अंधकार से

अज्ञान के अंधकार से-

विश्व आज जूझ रहा,

रौशनी मिलेगी कहां? 

फिर से आज ढूंढ रहा। 

साम-दाम-दण्ड-भेद, 

काम-क्रोध-लोभ-मद, 

इर्ष्या-अहं-शोक-दम्भ, 

जैसे तम में डूब रहा। 

आओ मानव आगे आओ, 

विश्व विजय का शंख बजाओ। 

मन से अंधकार भगाओ, 

फिर से मिलकर दीप जलाओ॥

शुभ्रा की भी अरदास है

करो रौशनी धीर धरा पर 

मन का अंधियारा जायेगा, 

है साक्षी इतिहास भी-

नया सवेरा आयेगा॥

आँखों ने आँखों से आँखों में कुछ कहा

आँखों ने आँखों से आँखों में कुछ कहा, 

आँखों ने आँखो में आँखों से कुछ सुना। 

आँखो ने आँखों से शरारत की, 

आँखों ने आँखों में ही- 

आँखों को डाँट लगाई ॥

आँखों ने रूठकर आँखों से प्यार जताया, 

आँखों ने आँखों में ही-

आँखों को पुचकार लगाई॥

लोगों ने समझा ही नहीं, 

इतने प्यार भरे, आखिर ये दो प्रेमी कौन हैं भाई? 

अरे गर समझ गये तो अच्छा है, 

नहीं समझे तो मैं बताती हुँ-

पहला तो है प्यारा बच्चा, 

दुसरी उसकी सबसे प्यारी माई॥ 

जिंदगी

रिश्तों की प्यारी सी एहसास है जिंदगी, 
कभी दूर कभी बहुत पास है जिंदगी। 
उथलते-पूथलते सागर में कभी डूबती नाव, 
तो कभी लगे बहुत खास है जिंदगी ॥
बचपन का भविष्य है युवा में वर्तमान, 
बुढ़ापे में अतीत की मिठास है जिंदगी ॥
कभी आसमां को चीरती ऊंचाई है, 
कभी बकवास है जिंदगी ॥
प्रेमियों की धड़कन है तो-
वीरों की तलवार है जिंदगी ॥
अमीरों का घमंड है तो - 
गरीबों का गुमान है जिंदगी ॥
रसिकों का विलास है तो - 
संतों का भगवान् है जिंदगी ॥
पानी के बुलबुले की भांति
 कुछ पल का एहसास है जिंदगी ॥
सोंचा तो कुछ भी नहीं, 
सोंचा तो हर श्वास है जिंदगी ॥
रिश्तों की मीठी सी मुस्कान है जिंदगी ॥

कलम कहे मैं लिखुं क्या? 

कलम कहे मैं लिखुं क्या? 

मैं राजनीति की बात लिखुं, 

या मानवता की साख लिखुं। 

शिक्षा लिखुं या लिखुं खेल, 

मोबाइल लिखुं या डाक मेल। 

सबको सिखाते यह भूल गयी, 

दुनिया में मैं सीखूं क्या-

कलम कहे मैं लिखुं क्या? 

रामायण लिखुं या महाभारत, 

बाइबिल कुरान और गीता की सुसीख भी लगती नादारद। 

मैं डाल लिखुं या लिखुं पात, 

नफरत की बात या प्यार का साथ। 

सब उलझे हैं उल्टे पल्टे, 

सब दाल-भात में हैं घुलते। 

मैं रात-रात भर पड़ी-पड़ी, 

परिस्थितियों से जकड़ी- जकड़ी, 

अपने सपनों में ही खोई-

सोई-सोई अब करुं क्या-

कलम कहे अब करुं क्या? 

अब नहीं कहीं भी दया मोह, 

अपनापन से सबका बिछोह,

सोशल साइट्स से जुड़े हैं सब, 

करते हैं आत्मा से ही द्रोह, 

दुःखी कलम सोचती है बस, 

अब धरी-धरी मैं करुं क्या-

कलम कहे मैं लिखुं क्या?

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