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गणेश जी की कहानियां

महाभारत और गणेश जी 

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महाभारत की रचना जब वेद व्यास जी करने वाले थे, उन्हें एक बहुत ही बुद्धिमान लेखक चाहिए था। तब ब्रह्मा जी के कहने पर उन्होंने इस कार्य हेतु गणेश जी की आराधना की। गणेश जी इस कार्य के लिए तैयार तो हो गये, परन्तु उन्होंने एक शर्त रखी कि, -महाभारत महाकाव्य लिखवाने के मध्य में व्यास जी यदि कहीं रुके तो वे अर्थात गणेश जी इस काव्य को मध्य में ही छोड़कर चले जाएंगे। 
तब व्यास सोच में पड़ गए।कुछ सोचकर उन्होंने गणपति से यह निवेदन किया कि वे(व्यासजी) अपनी बातों को कठिन श्लोक में कहेंगे लेकिन उस श्लोक को लिपिबद्ध करने से पूर्व गणेश जी उसे सरल श्लोकों में परिवर्तित कर लेंगे। तब गजानन उनकी बुद्धिमत्ता को देखकर अतिप्रसन्न होते हुए उनके रचित काव्य को लिपिबद्ध करने के लिए सहमति हो गये। 
कहा जाता है कि इस दौरान उन गौरीपूत्र की लेखनी टूट गयी परन्तु उन्होंने लेखन कार्य को रोका नही अपितु अपने एक दांत को तोड़ कर उसकी लेखनी बनाई और उन विघ्नहर्ता ने निर्विघ्न रूप से यह महाकाव्य पूर्ण किया। तभी से गजमुख का एक नाम एकदन्त भी पड़ गया।

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